दिल की आग को अभी न यूँ बुझा
ये उम्मीद आखिरी, न यूँ बुझा
जीत जाए फिर कहीं न तीरगी
चाँद! अपनी चांदनी न यूँ बुझा
फिर मज़ा न प्यास का मैं ले सकूँ
इन लबों की तिश्नगी न यूँ बुझा
ऐतबार के दीये, ऐ बेवफा!
फिर न जल सकें कभी, न यूँ बुझा
चश्म-ए-आफताब मुझ से यूँ न फेर
राह की ये रौशनी, न यूँ बुझा
सोच को मिलता नहीं कभी सुकून, हैं कई सवाल हर जवाब में...... कश्तियाँ 'साहिल' तुझे हैं ढूँढतीं, और तू डूबा है खुद सैलाब में
May 30, 2013
September 22, 2012
मुक्तक
हैरतों में ये उजाला पड़ गया
जुगनुओं के मुंह पे ताला पड़ गया
आपकी उजली हंसी को देखकर
चाँद का भी रंग काला पड़ गया
************************************
खिज़ा में भी फिज़ा के कुछ इशारे मिल ही जाते हैं
अँधेरी रात हो कितनी, सितारे मिल ही जाते हैं
जिसे तेरी मुहब्बत के सहारे मिल गए, उसको
बहुत हो तेज़ तूफां, पर किनारे मिल ही जाते हैं
*************************************
जाने क्यूँ झूठा तराना लिख रहे हो
मौसमों को आशिकाना लिख रहे हो
इक परिंदे सा क़फ़स में कैद हूँ मैं
आप इसको आशियाना लिख रहे हो!
जुगनुओं के मुंह पे ताला पड़ गया
आपकी उजली हंसी को देखकर
चाँद का भी रंग काला पड़ गया
************************************
खिज़ा में भी फिज़ा के कुछ इशारे मिल ही जाते हैं
अँधेरी रात हो कितनी, सितारे मिल ही जाते हैं
जिसे तेरी मुहब्बत के सहारे मिल गए, उसको
बहुत हो तेज़ तूफां, पर किनारे मिल ही जाते हैं
*************************************
जाने क्यूँ झूठा तराना लिख रहे हो
मौसमों को आशिकाना लिख रहे हो
इक परिंदे सा क़फ़स में कैद हूँ मैं
आप इसको आशियाना लिख रहे हो!
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April 25, 2012
आईने के पास जाने से बचे
रस्म-ए-दुनिया को निभाने से बचे,
किस तरह कोई ज़माने से बचे?
दोस्तों की सब हकीकत थी पता
इसलिए तो आज़माने से बचे
सांस को मैं रोक लूँ कुछ देर, पर
वक़्त कब ऐसे बचाने से बचे
वो भी खुल के कब मिला हमसे कभी
हाल-ए-दिल हम भी सुनाने से बचे
जब भी 'साहिल' याद आयें हैं गुनाह,
आईने के पास जाने से बचे
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January 04, 2012
मेरे लिए फिर सहर है आगे
बहुत सुहाना सफ़र है आगे
के फिर उसी का शहर है आगे
मुझे पता है, सियाह रातों
मेरे लिए फिर सहर है आगे
लगी हुई है जो भीड़ इतनी,
किसी दीवाने का घर है आगे
सफ़र समंदर का, मत शुरू कर
जो डूब जाने का डर है आगे
ये चलना 'साहिल' भी क्या है चलना
ख्याल पीछे, नज़र है आगे
के फिर उसी का शहर है आगे
मुझे पता है, सियाह रातों
मेरे लिए फिर सहर है आगे
लगी हुई है जो भीड़ इतनी,
किसी दीवाने का घर है आगे
सफ़र समंदर का, मत शुरू कर
जो डूब जाने का डर है आगे
ये चलना 'साहिल' भी क्या है चलना
ख्याल पीछे, नज़र है आगे
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November 28, 2011
जिस्म में खंज़र उतरने लग गया
रंग सुबह का बिखरने लग गया
इक हसीं चेहरा उभरने लग गया
दूर हूँ जो आप से, तो यूँ लगा
वक़्त आहिस्ता गुज़रने लग गया
सीना-ए-शब पर खिला हैं चाँद फिर
जिस्म में खंज़र उतरने लग गया
इश्क में, बस ज़ख्म इक हासिल हुआ
ज़ख्म भी ऐसा के भरने लग गया
ज़िन्दगी का पैराहन जिस पल मिला,
वक़्त का चूहा कुतरने लग गया
आपका जो अक्स इस पर आ पड़ा
आइना देखो, सँवरने लग गया
इक हसीं चेहरा उभरने लग गया
दूर हूँ जो आप से, तो यूँ लगा
वक़्त आहिस्ता गुज़रने लग गया
सीना-ए-शब पर खिला हैं चाँद फिर
जिस्म में खंज़र उतरने लग गया
इश्क में, बस ज़ख्म इक हासिल हुआ
ज़ख्म भी ऐसा के भरने लग गया
ज़िन्दगी का पैराहन जिस पल मिला,
वक़्त का चूहा कुतरने लग गया
आपका जो अक्स इस पर आ पड़ा
आइना देखो, सँवरने लग गया
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November 08, 2011
दुनिया से हरदम मिलते हैं, खुद से लेकिन कम मिलते हैं
दुनिया से हरदम मिलते हैं
खुद से लेकिन कम मिलते हैं
आशिक हैं वो, सुबह-सवेरे
जिनके तकिये नम मिलते हैं
जब भी देखूं तेरा चेहरा
ज़ख्मों को मरहम मिलते हैं
वो क्या जाने प्यास हमारी,
जिनको जाम-ओ-जम मिलते हैं
तेरी यादों से, आँखों को,
बारिश के मौसम मिलते हैं
'साहिल', हैं सब कहने वाले
सुनने वाले, कम मिलते हैं
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October 07, 2011
मैं भी जिम्मेवार हूँ हालात का
क्यूँ बुरा मानूं किसी की बात का?
मैं भी जिम्मेवार हूँ हालात का
हुक्मरां उसको न माने दिल मेरा
सर पे जिसके ताज है खैरात का
मै अभी सूखे से उबरा ही न था,
घर में पानी आ गया बरसात का
फूल, भंवरे, रात, जुगनू, चांदनी
शुक्रिया! मेरे खुदा सौगात का
फिर शफ़क़ ने दूर कर दी तीरगी
सुर्ख मुंह है फिर शरम से रात का
मैं भी जिम्मेवार हूँ हालात का
हुक्मरां उसको न माने दिल मेरा
सर पे जिसके ताज है खैरात का
मै अभी सूखे से उबरा ही न था,
घर में पानी आ गया बरसात का
फूल, भंवरे, रात, जुगनू, चांदनी
शुक्रिया! मेरे खुदा सौगात का
फिर शफ़क़ ने दूर कर दी तीरगी
सुर्ख मुंह है फिर शरम से रात का
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September 09, 2011
इस मरुस्थल को नदी की धार दो
गीली माटी हूँ, मुझे आकार दो
मेरे जीवन को कोई आधार दो
घाव दो या अश्रुओं का हार दो
जो उचित हो प्रेम में, उपहार दो
फिर धरा पर प्रेम बन बरसो कभी
इस मरुस्थल को नदी की धार दो
मोर को सावन, भंवर को फूल दो
सबको अपने हिस्से का संसार दो
स्वप्न के पंछी नयन-पिंजरे में हैं,
दो इन्हें आकाश का विस्तार दो
हूँ अगर जीवित तो तट पर क्या करूँ?
मेरी नैया को कोई मझधार दो
मेरे जीवन को कोई आधार दो
घाव दो या अश्रुओं का हार दो
जो उचित हो प्रेम में, उपहार दो
फिर धरा पर प्रेम बन बरसो कभी
इस मरुस्थल को नदी की धार दो
मोर को सावन, भंवर को फूल दो
सबको अपने हिस्से का संसार दो
स्वप्न के पंछी नयन-पिंजरे में हैं,
दो इन्हें आकाश का विस्तार दो
हूँ अगर जीवित तो तट पर क्या करूँ?
मेरी नैया को कोई मझधार दो
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August 12, 2011
चीख बैठे बेज़ुबां तक
इस ज़मीं से आसमां तक
तू दिखे, देखूं जहां तक
उसने बेशक ना सुना हो
बात तो आई जुबां तक
मैं तो तन्हा था मुसाफिर
लुट गए याँ कारवां तक
यूँ चिराग-ए-शब बुझा था,
हाथ न आया धुआं तक
हद सितम की हो गयी अब,
चीख बैठे बेज़ुबां तक
तू दिखे, देखूं जहां तक
उसने बेशक ना सुना हो
बात तो आई जुबां तक
मैं तो तन्हा था मुसाफिर
लुट गए याँ कारवां तक
यूँ चिराग-ए-शब बुझा था,
हाथ न आया धुआं तक
हद सितम की हो गयी अब,
चीख बैठे बेज़ुबां तक
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July 16, 2011
एक कहानी याद किसे?
'राजा-रानी' याद किसे?
एक कहानी याद किसे?
बरसों बीते गाँव गए
बूढी नानी याद किसे?
किसने किसका तोडा था दिल
बात पुरानी याद किसे?
एक नदी सागर में खोई
वो दीवानी याद किसे?
बरसों बीते सूखे में, अब
बादल-पानी याद किसे?
नफरत हो बैठा है मज़हब,
प्यार के मानी याद किसे?
'साहिल' गुज़रा तूफां, तेरी
मेहरबानी याद किसे?
एक कहानी याद किसे?
बरसों बीते गाँव गए
बूढी नानी याद किसे?
किसने किसका तोडा था दिल
बात पुरानी याद किसे?
एक नदी सागर में खोई
वो दीवानी याद किसे?
बरसों बीते सूखे में, अब
बादल-पानी याद किसे?
नफरत हो बैठा है मज़हब,
प्यार के मानी याद किसे?
'साहिल' गुज़रा तूफां, तेरी
मेहरबानी याद किसे?
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