दिल की आग को अभी न यूँ बुझा
ये उम्मीद आखिरी, न यूँ बुझा
जीत जाए फिर कहीं न तीरगी
चाँद! अपनी चांदनी न यूँ बुझा
फिर मज़ा न प्यास का मैं ले सकूँ
इन लबों की तिश्नगी न यूँ बुझा
ऐतबार के दीये, ऐ बेवफा!
फिर न जल सकें कभी, न यूँ बुझा
चश्म-ए-आफताब मुझ से यूँ न फेर
राह की ये रौशनी, न यूँ बुझा
सोच को मिलता नहीं कभी सुकून, हैं कई सवाल हर जवाब में...... कश्तियाँ 'साहिल' तुझे हैं ढूँढतीं, और तू डूबा है खुद सैलाब में
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May 30, 2013
April 25, 2012
आईने के पास जाने से बचे
रस्म-ए-दुनिया को निभाने से बचे,
किस तरह कोई ज़माने से बचे?
दोस्तों की सब हकीकत थी पता
इसलिए तो आज़माने से बचे
सांस को मैं रोक लूँ कुछ देर, पर
वक़्त कब ऐसे बचाने से बचे
वो भी खुल के कब मिला हमसे कभी
हाल-ए-दिल हम भी सुनाने से बचे
जब भी 'साहिल' याद आयें हैं गुनाह,
आईने के पास जाने से बचे
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January 04, 2012
मेरे लिए फिर सहर है आगे
बहुत सुहाना सफ़र है आगे
के फिर उसी का शहर है आगे
मुझे पता है, सियाह रातों
मेरे लिए फिर सहर है आगे
लगी हुई है जो भीड़ इतनी,
किसी दीवाने का घर है आगे
सफ़र समंदर का, मत शुरू कर
जो डूब जाने का डर है आगे
ये चलना 'साहिल' भी क्या है चलना
ख्याल पीछे, नज़र है आगे
के फिर उसी का शहर है आगे
मुझे पता है, सियाह रातों
मेरे लिए फिर सहर है आगे
लगी हुई है जो भीड़ इतनी,
किसी दीवाने का घर है आगे
सफ़र समंदर का, मत शुरू कर
जो डूब जाने का डर है आगे
ये चलना 'साहिल' भी क्या है चलना
ख्याल पीछे, नज़र है आगे
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November 28, 2011
जिस्म में खंज़र उतरने लग गया
रंग सुबह का बिखरने लग गया
इक हसीं चेहरा उभरने लग गया
दूर हूँ जो आप से, तो यूँ लगा
वक़्त आहिस्ता गुज़रने लग गया
सीना-ए-शब पर खिला हैं चाँद फिर
जिस्म में खंज़र उतरने लग गया
इश्क में, बस ज़ख्म इक हासिल हुआ
ज़ख्म भी ऐसा के भरने लग गया
ज़िन्दगी का पैराहन जिस पल मिला,
वक़्त का चूहा कुतरने लग गया
आपका जो अक्स इस पर आ पड़ा
आइना देखो, सँवरने लग गया
इक हसीं चेहरा उभरने लग गया
दूर हूँ जो आप से, तो यूँ लगा
वक़्त आहिस्ता गुज़रने लग गया
सीना-ए-शब पर खिला हैं चाँद फिर
जिस्म में खंज़र उतरने लग गया
इश्क में, बस ज़ख्म इक हासिल हुआ
ज़ख्म भी ऐसा के भरने लग गया
ज़िन्दगी का पैराहन जिस पल मिला,
वक़्त का चूहा कुतरने लग गया
आपका जो अक्स इस पर आ पड़ा
आइना देखो, सँवरने लग गया
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November 08, 2011
दुनिया से हरदम मिलते हैं, खुद से लेकिन कम मिलते हैं
दुनिया से हरदम मिलते हैं
खुद से लेकिन कम मिलते हैं
आशिक हैं वो, सुबह-सवेरे
जिनके तकिये नम मिलते हैं
जब भी देखूं तेरा चेहरा
ज़ख्मों को मरहम मिलते हैं
वो क्या जाने प्यास हमारी,
जिनको जाम-ओ-जम मिलते हैं
तेरी यादों से, आँखों को,
बारिश के मौसम मिलते हैं
'साहिल', हैं सब कहने वाले
सुनने वाले, कम मिलते हैं
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October 07, 2011
मैं भी जिम्मेवार हूँ हालात का
क्यूँ बुरा मानूं किसी की बात का?
मैं भी जिम्मेवार हूँ हालात का
हुक्मरां उसको न माने दिल मेरा
सर पे जिसके ताज है खैरात का
मै अभी सूखे से उबरा ही न था,
घर में पानी आ गया बरसात का
फूल, भंवरे, रात, जुगनू, चांदनी
शुक्रिया! मेरे खुदा सौगात का
फिर शफ़क़ ने दूर कर दी तीरगी
सुर्ख मुंह है फिर शरम से रात का
मैं भी जिम्मेवार हूँ हालात का
हुक्मरां उसको न माने दिल मेरा
सर पे जिसके ताज है खैरात का
मै अभी सूखे से उबरा ही न था,
घर में पानी आ गया बरसात का
फूल, भंवरे, रात, जुगनू, चांदनी
शुक्रिया! मेरे खुदा सौगात का
फिर शफ़क़ ने दूर कर दी तीरगी
सुर्ख मुंह है फिर शरम से रात का
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September 09, 2011
इस मरुस्थल को नदी की धार दो
गीली माटी हूँ, मुझे आकार दो
मेरे जीवन को कोई आधार दो
घाव दो या अश्रुओं का हार दो
जो उचित हो प्रेम में, उपहार दो
फिर धरा पर प्रेम बन बरसो कभी
इस मरुस्थल को नदी की धार दो
मोर को सावन, भंवर को फूल दो
सबको अपने हिस्से का संसार दो
स्वप्न के पंछी नयन-पिंजरे में हैं,
दो इन्हें आकाश का विस्तार दो
हूँ अगर जीवित तो तट पर क्या करूँ?
मेरी नैया को कोई मझधार दो
मेरे जीवन को कोई आधार दो
घाव दो या अश्रुओं का हार दो
जो उचित हो प्रेम में, उपहार दो
फिर धरा पर प्रेम बन बरसो कभी
इस मरुस्थल को नदी की धार दो
मोर को सावन, भंवर को फूल दो
सबको अपने हिस्से का संसार दो
स्वप्न के पंछी नयन-पिंजरे में हैं,
दो इन्हें आकाश का विस्तार दो
हूँ अगर जीवित तो तट पर क्या करूँ?
मेरी नैया को कोई मझधार दो
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August 12, 2011
चीख बैठे बेज़ुबां तक
इस ज़मीं से आसमां तक
तू दिखे, देखूं जहां तक
उसने बेशक ना सुना हो
बात तो आई जुबां तक
मैं तो तन्हा था मुसाफिर
लुट गए याँ कारवां तक
यूँ चिराग-ए-शब बुझा था,
हाथ न आया धुआं तक
हद सितम की हो गयी अब,
चीख बैठे बेज़ुबां तक
तू दिखे, देखूं जहां तक
उसने बेशक ना सुना हो
बात तो आई जुबां तक
मैं तो तन्हा था मुसाफिर
लुट गए याँ कारवां तक
यूँ चिराग-ए-शब बुझा था,
हाथ न आया धुआं तक
हद सितम की हो गयी अब,
चीख बैठे बेज़ुबां तक
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July 16, 2011
एक कहानी याद किसे?
'राजा-रानी' याद किसे?
एक कहानी याद किसे?
बरसों बीते गाँव गए
बूढी नानी याद किसे?
किसने किसका तोडा था दिल
बात पुरानी याद किसे?
एक नदी सागर में खोई
वो दीवानी याद किसे?
बरसों बीते सूखे में, अब
बादल-पानी याद किसे?
नफरत हो बैठा है मज़हब,
प्यार के मानी याद किसे?
'साहिल' गुज़रा तूफां, तेरी
मेहरबानी याद किसे?
एक कहानी याद किसे?
बरसों बीते गाँव गए
बूढी नानी याद किसे?
किसने किसका तोडा था दिल
बात पुरानी याद किसे?
एक नदी सागर में खोई
वो दीवानी याद किसे?
बरसों बीते सूखे में, अब
बादल-पानी याद किसे?
नफरत हो बैठा है मज़हब,
प्यार के मानी याद किसे?
'साहिल' गुज़रा तूफां, तेरी
मेहरबानी याद किसे?
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June 04, 2011
बन के 'साहिल' मैं फिर उभर जाऊं
तुम मिलो गर, तो मैं संवर जाऊँ
ज़ख्म हूँ इक, ज़रा सा भर जाऊँ
बन के दरिया भटक रहा कब से,
कोई सागर मिले, उतर जाऊँ
राह में फिर तेरा ही कूचा है
सोचता हूँ, रुकूँ, गुज़र जाऊँ?
भूखे बच्चों का सामना होगा
हाथ खाली हैं, कैसे घर जाऊँ?
दो घड़ी सांस भी न लेने दे,
वक़्त ठहरे, तो मैं ठहर जाऊँ
डूब जाऊं अगर तूफानों में
बन के 'साहिल' मैं फिर उभर जाऊं
ज़ख्म हूँ इक, ज़रा सा भर जाऊँ
बन के दरिया भटक रहा कब से,
कोई सागर मिले, उतर जाऊँ
राह में फिर तेरा ही कूचा है
सोचता हूँ, रुकूँ, गुज़र जाऊँ?
भूखे बच्चों का सामना होगा
हाथ खाली हैं, कैसे घर जाऊँ?
दो घड़ी सांस भी न लेने दे,
वक़्त ठहरे, तो मैं ठहर जाऊँ
डूब जाऊं अगर तूफानों में
बन के 'साहिल' मैं फिर उभर जाऊं
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April 27, 2011
OBO live पर पूर्वप्रकाशित!
अँधेरा है नुमायाँ बस्तियों में
उजाले कैद हैं कुछ मुट्ठियों में
ये पीकर तेल भी, जलते नहीं हैं
लहू भरना ही होगा अब दीयों में
फ़लक पर जो दिखा था एक सूरज
कहीं गुम हो गया परछाइयों में
तेरी महफ़िल से जी उकता गया है,
सुकूँ मिलता है बस तन्हाईयों में
लिए जाता हूँ कश, मैं फिर लिए हूँ
तेरी यादों की 'सिगरेट' उँगलियों में
उतरना ध्यान से दरिया में 'साहिल'
मगरमच्छ भी छुपे हैं, मछलियों में
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March 26, 2011
ज़िन्दगी तूने हमें ऐसे चुभाये हैं गुलाब
हमराही पर पूर्वप्रकाशित
कब से ये काँटों में हैं, क्यों ज़ख्म खाए हैं गुलाब?
अपने खूँ के लाल रंगों में नहाये हैं गुलाब।
फर्क इतना है हमारी और उसकी सोच में,
उसने थामी हैं बंदूकें, हम उठाये हैं गुलाब।
होश अब कैसे रहे, अब लड़खड़ाएँ क्यों न हम,
घोल कर उसने निगाहों में, पिलाये हैं गुलाब।
अब असर होता नहीं गर पाँव में काँटा चुभे,
ज़िन्दगी तूने हमें ऐसे चुभाये हैं गुलाब।
कुछ पसीने की महक, कुछ लाल मेरे खूँ का रंग,
तब कहीं जाकर ज़मीं ने ये उगाये हैं गुलाब।
खार होंगे, संग होंगे, और होगा क्या वहां?
इश्क की गलियों में 'साहिल' किसने पाए हैं गुलाब?
कब से ये काँटों में हैं, क्यों ज़ख्म खाए हैं गुलाब?
अपने खूँ के लाल रंगों में नहाये हैं गुलाब।
फर्क इतना है हमारी और उसकी सोच में,
उसने थामी हैं बंदूकें, हम उठाये हैं गुलाब।
होश अब कैसे रहे, अब लड़खड़ाएँ क्यों न हम,
घोल कर उसने निगाहों में, पिलाये हैं गुलाब।
अब असर होता नहीं गर पाँव में काँटा चुभे,
ज़िन्दगी तूने हमें ऐसे चुभाये हैं गुलाब।
कुछ पसीने की महक, कुछ लाल मेरे खूँ का रंग,
तब कहीं जाकर ज़मीं ने ये उगाये हैं गुलाब।
खार होंगे, संग होंगे, और होगा क्या वहां?
इश्क की गलियों में 'साहिल' किसने पाए हैं गुलाब?
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February 07, 2011
हर किसी से निबाह किसकी है?
जुस्तज़ू किसकी, चाह किसकी है?
मुन्तज़िर ये निगाह किसकी है?
जलते सहराओं में महकता है,
तुझको ऐ गुल, पनाह किसकी है?
ये मुहब्बत गुनाह है, तो फिर
ज़िन्दगी बेगुनाह किसकी है?
जिसको देखूँ है ग़मज़दा वो ही,
किसको पूछूँ के आह किसकी है?
चाँद-तारे, चराग ना जुगनू,
रात इतनी तबाह किसकी है?
कुछ उदू भी जहां में हैं अपने
हर किसी से निबाह किसकी है?
तेरी किस्मत तो है जुदा 'साहिल'
और इतनी स्याह किसकी है?
मुन्तज़िर ये निगाह किसकी है?
जलते सहराओं में महकता है,
तुझको ऐ गुल, पनाह किसकी है?
ये मुहब्बत गुनाह है, तो फिर
ज़िन्दगी बेगुनाह किसकी है?
जिसको देखूँ है ग़मज़दा वो ही,
किसको पूछूँ के आह किसकी है?
चाँद-तारे, चराग ना जुगनू,
रात इतनी तबाह किसकी है?
कुछ उदू भी जहां में हैं अपने
हर किसी से निबाह किसकी है?
तेरी किस्मत तो है जुदा 'साहिल'
और इतनी स्याह किसकी है?
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January 24, 2011
घर जलाने को लोग फिर आये
दिल दुखाने को लोग फिर आये
आज़माने को लोग फिर आये
एक किस्सा मैं भूल बैठा था,
दोहराने को लोग फिर आये
साथ देंगे ये बस घड़ी भर का
लौट जाने को लोग फिर आये
मंदिरों-मस्जिदों की बातों पर
घर जलाने को लोग फिर आये
हादसों को भुला के, महफ़िल में
हंसने-गाने को लोग फिर आये
फिर कतारें हैं दर पे कातिल के
सर कटाने को लोग फिर आये
'दूध के सब जले हैं' ये लेकिन,
धोखा खाने को लोग फिर आये
रास आया इन्हें न 'साहिल' तू,
डूब जाने को लोग फिर आये
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January 17, 2011
उस को माज़ी का कुछ ख्याल रहा
तेरी यादों का दिल पे जाल रहा
ज़ख्म पर रेशमी रुमाल रहा
खुद ही दिल से तुझे निकाला था,
ये अलग बात के मलाल रहा
एक बस तुझ से ही तवक्को थी
ऐ खुदा! तू भी बेख्याल रहा
अच्छा होगा, कहा था वाइज़ ने
पहले जैसा मगर ये साल रहा
तूने लिक्खे तो हैं जवाब कई
दिल में लेकिन वही सवाल रहा
शुक्र है, हंस के वो मिला 'साहिल'
उस को माज़ी का कुछ ख्याल रहा
ज़ख्म पर रेशमी रुमाल रहा
खुद ही दिल से तुझे निकाला था,
ये अलग बात के मलाल रहा
एक बस तुझ से ही तवक्को थी
ऐ खुदा! तू भी बेख्याल रहा
अच्छा होगा, कहा था वाइज़ ने
पहले जैसा मगर ये साल रहा
तूने लिक्खे तो हैं जवाब कई
दिल में लेकिन वही सवाल रहा
शुक्र है, हंस के वो मिला 'साहिल'
उस को माज़ी का कुछ ख्याल रहा
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तवक्को = उम्मीद, expectation , hope
वाइज़ = preacher
माज़ी = गुज़रा वक़्त, past
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January 07, 2011
मेरे दामन से उलझे हैं, खिज़ां के ख़ार बाकी हैं
हमारी ज़िन्दगी के अब जो दिन दो चार बाकी हैं
न हो दीदार-ऐ-हुस्न-ऐ-यार तो बेकार बाकी हैं
न बदली फितरत-ऐ-लैला-ओ-कैस-ओ-शीरी-ओ- फरहाद
वही आशिक हैं ज़िन्दा, उनके कारोबार बाकी हैं
मैं कैसे लुत्फ़ लूं यारो, अभी अब्र-ऐ-बहारां का
मेरे दामन से उलझे हैं, खिज़ां के ख़ार बाकी हैं
हबीबों के सितम से इस कदर घबरा न मेरे दिल!
अभी तो इस जहाँ में कुछ मेरे अगयार बाकी हैं
ऐ 'साहिल', इस जहाँ में बस तेरी हस्ती इसी से है
के तू बाकी है जब तक ये तेरे अशआर बाकी हैं
न हो दीदार-ऐ-हुस्न-ऐ-यार तो बेकार बाकी हैं
न बदली फितरत-ऐ-लैला-ओ-कैस-ओ-शीरी-ओ-
वही आशिक हैं ज़िन्दा, उनके कारोबार बाकी हैं
मैं कैसे लुत्फ़ लूं यारो, अभी अब्र-ऐ-बहारां का
मेरे दामन से उलझे हैं, खिज़ां के ख़ार बाकी हैं
हबीबों के सितम से इस कदर घबरा न मेरे दिल!
अभी तो इस जहाँ में कुछ मेरे अगयार बाकी हैं
ऐ 'साहिल', इस जहाँ में बस तेरी हस्ती इसी से है
के तू बाकी है जब तक ये तेरे अशआर बाकी हैं
खार = कांटें
फितरत = nature
अब्र-ऐ-बहारां = बहार के बादल
हबीब = दोस्त
अगयार = दुश्मन, rival
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December 22, 2010
उल्फत ही मज़हब है अपना
उसकी चौखट रब है अपना
उल्फत ही मज़हब है अपना
दुनिया अपनी, दुनिया के हम
अपना क्या है? सब है अपना!
वो जो मीठा मीठा बोले
उसका कुछ मतलब है अपना
उसकी यादों में खोया है
अपना दिल भी कब है अपना?
सांसों की डोरी पर चलना
जीना भी, करतब है अपना
उल्फत ही मज़हब है अपना
दुनिया अपनी, दुनिया के हम
अपना क्या है? सब है अपना!
वो जो मीठा मीठा बोले
उसका कुछ मतलब है अपना
उसकी यादों में खोया है
अपना दिल भी कब है अपना?
सांसों की डोरी पर चलना
जीना भी, करतब है अपना
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December 11, 2010
वो खुदा है या है पत्थर, क्या पता?
सब झुकाते हैं जहाँ सर, क्या पता?
वो खुदा है या है पत्थर, क्या पता?
दोस्त भी दुश्मन भी सब हंसकर मिले
किसके पहलू में है खंज़र, क्या पता?
कब न जाने ख़त्म होगा ये सफ़र?
लौट के कब जायेंगे घर, क्या पता?
आज मेरी दोस्त है तू ज़िन्दगी
कल दिखाए कैसे मंज़र, क्या पता?
क़त्ल मुझ को वो नहीं कर पायेगा
चाहता है वो मुझे, पर क्या पता?
कब बहा ले जाएँ 'साहिल' ये तुझे,
नीयत-ऐ-मौज-ऐ-समंदर, क्या पता?
वो खुदा है या है पत्थर, क्या पता?
दोस्त भी दुश्मन भी सब हंसकर मिले
किसके पहलू में है खंज़र, क्या पता?
कब न जाने ख़त्म होगा ये सफ़र?
लौट के कब जायेंगे घर, क्या पता?
आज मेरी दोस्त है तू ज़िन्दगी
कल दिखाए कैसे मंज़र, क्या पता?
क़त्ल मुझ को वो नहीं कर पायेगा
चाहता है वो मुझे, पर क्या पता?
कब बहा ले जाएँ 'साहिल' ये तुझे,
नीयत-ऐ-मौज-ऐ-समंदर, क्या पता?
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November 24, 2010
ख़त तुझे मैंने बेहिसाब लिखे
कोई ऐसी भी इक किताब लिखे
सब सवालों के सब जवाब लिखे
हमने काली स्याह रात में भी
जगमगाते हुए से ख्वाब लिखे
कोई चेहरा भला पढूं कैसे
सबके चेहरों पे हैं नकाब लिखे
अब यहाँ हो रही नीलाम कलम
कौन है जो के इन्कलाब लिखे
कोई माली है जो नसीब लिखे
कहीं कांटे कहीं गुलाब लिखे
ये अलग बात, भेजता ही नहीं
ख़त तुझे मैंने बेहिसाब लिखे
जाने 'साहिल' तुझे हुआ क्या है
इक ज़रा मौज को सैलाब लिखे
सब सवालों के सब जवाब लिखे
हमने काली स्याह रात में भी
जगमगाते हुए से ख्वाब लिखे
कोई चेहरा भला पढूं कैसे
सबके चेहरों पे हैं नकाब लिखे
अब यहाँ हो रही नीलाम कलम
कौन है जो के इन्कलाब लिखे
कोई माली है जो नसीब लिखे
कहीं कांटे कहीं गुलाब लिखे
ये अलग बात, भेजता ही नहीं
ख़त तुझे मैंने बेहिसाब लिखे
जाने 'साहिल' तुझे हुआ क्या है
इक ज़रा मौज को सैलाब लिखे
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November 15, 2010
ये चार दिन की चांदनी अच्छी नहीं लगती मुझे
आँखों मैं तेरे बेबसी अच्छी नहीं लगती मुझे
इतना न रो के ये नमी अच्छी नहीं लगती मुझे
फिर इस अँधेरी रात में, सोना नहीं भाता मुझे
ये चार दिन की चांदनी अच्छी नहीं लगती मुझे
खोया हूँ उसकी याद में, बाद-ऐ-सबा न शोर कर
वक़्त-ऐ-इबादत दिल्लगी अच्छी नहीं लगती मुझे
तेरे लिए छुपता फिरूं मैं कब तलक यूँ मौत से
इतनी तो तू ऐ ज़िन्दगी! अच्छी नहीं लगती मुझे
मैंने ये पूछा 'आप क्यों पढ़ते नहीं मेरी ग़ज़ल?'
वो हंस के बोले 'बस यूँ ही, अच्छी नहीं लगती मुझे'
कहता है दिल की बात क्यों 'साहिल' भला तू गैर से,
बस इक यही आदत तेरी अच्छी नहीं लगती मुझे
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इतना न रो के ये नमी अच्छी नहीं लगती मुझे
फिर इस अँधेरी रात में, सोना नहीं भाता मुझे
ये चार दिन की चांदनी अच्छी नहीं लगती मुझे
खोया हूँ उसकी याद में, बाद-ऐ-सबा न शोर कर
वक़्त-ऐ-इबादत दिल्लगी अच्छी नहीं लगती मुझे
तेरे लिए छुपता फिरूं मैं कब तलक यूँ मौत से
इतनी तो तू ऐ ज़िन्दगी! अच्छी नहीं लगती मुझे
मैंने ये पूछा 'आप क्यों पढ़ते नहीं मेरी ग़ज़ल?'
वो हंस के बोले 'बस यूँ ही, अच्छी नहीं लगती मुझे'
कहता है दिल की बात क्यों 'साहिल' भला तू गैर से,
बस इक यही आदत तेरी अच्छी नहीं लगती मुझे
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बाद-ऐ-सबा = सुबह की हवा, morning breeze
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