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February 28, 2011

त्रिवेणियाँ



आईने से मिला था मैं हँस कर
आँख रोती हुई दिखाई दी
                आईना झूठ बोलता ही नहीं



रात के साहिलों पे हम ने भी
ख्वाब के कुछ महल बनाये थे
                 मौज-ए-सुबह में बह गया सब कुछ



ओढ़ कर रात सो गया सूरज,
ऊंघते हैं ये सब सितारे भी 
                   रतजगा चाँद को मिला क्यों है?



आढ़ी तिरछी सी खींच दी किसने?
कुछ लकीरें मेरी हथेली पर
                    इनमें ढूँढू भला तुम्हें कैसे?



October 21, 2010

त्रिवेणियाँ

भीगा भीगा है सुबह का आँचल
हर कली ओस में नहाई है
रात रोई है रात-भर शायद


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इस कदर स्याह है आज रात का रंग
चांदनी है न इक सितारा है
किसके अश्कों में घुल गया काजल

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बंद आँखों से सुन लिया मैंने 
कुछ किताबों का इल्म लोगों से
अब में दैर-ओ-हरम में उलझा हूँ 

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आज दिल की किताब झाड़ी तो
तेरी यादों की धूल उड़ती है
छींक तुझको भी आई तो होगी


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