January 07, 2011

मेरे दामन से उलझे हैं, खिज़ां के ख़ार बाकी हैं

हमारी ज़िन्दगी के अब जो दिन दो चार बाकी हैं
न हो दीदार-ऐ-हुस्न-ऐ-यार तो बेकार बाकी हैं

न बदली फितरत-ऐ-लैला-ओ-कैस-ओ-शीरी-ओ-
फरहाद
वही आशिक हैं ज़िन्दा, उनके कारोबार बाकी हैं

मैं कैसे लुत्फ़ लूं यारो, अभी अब्र-ऐ-बहारां का
मेरे दामन से उलझे हैं, खिज़ां के ख़ार बाकी हैं

हबीबों के सितम से इस कदर घबरा न मेरे दिल!
अभी तो इस जहाँ में कुछ मेरे अगयार बाकी हैं

ऐ 'साहिल', इस जहाँ में बस तेरी हस्ती इसी से है
के तू बाकी है जब तक ये तेरे अशआर बाकी हैं



खार = कांटें
फितरत = nature
अब्र-ऐ-बहारां = बहार के बादल
हबीब = दोस्त
अगयार = दुश्मन, rival

12 comments:

  1. बहुत बढ़िया ग़ज़ल साहिल साहब, एक एक शेर लाजवाब !!!

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  2. सुंदर अभिव्यक्ति...

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  3. bahut badhiya gazal hai bhai.

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  4. एक एक शेर लाजवाब
    आपको और आपके परिवार को मकर संक्रांति के पर्व की ढेरों शुभकामनाएँ !"

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  5. पहली बार पढ़ रहा हूँ आपको और भविष्य में भी पढना चाहूँगा सो आपका फालोवर बन रहा हूँ ! शुभकामनायें

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  6. इस गजल का हर एक शेर लाजबाब है ...बहुत खुबसूरत अंदाज है आपका प्रस्तुतीकरण का ...आपका आभार ....आप नित नए मुकाम हासिल करते रहें यही कामना है ...

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  7. bloga jagat men kam log hain jinki pakad craft aur khayal dono pe hoti hai..aapki ghazalen bhali bheli lageen... shubhkamnayen... :)

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  8. yupp...ye padhi hai maine, kayi baar padh chuki hoon...tryin to perfect the beher ;)

    bohot bohot khoobsurat sher hain saare...awesome job buddy :)

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  9. बहुत खूब साहिल जी ... सच कहा है ... बातें (अशार) बाकी रह जाते हैं ... प्रभावी ग़ज़ल है बहुत ही ..

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यहाँ आने का और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियों से नवाज़ने का शुक्रिया!

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